बोधगया से निरंजना (फल्गु) नदी के पार स्थित सुजाता स्तूप बौद्ध धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रद्धेय ऐतिहासिक स्थल है। यह वही पवित्र स्थान माना जाता है जहाँ ग्रामवधू सुजाता ने वर्षों की कठोर तपस्या से क्षीण हुए सिद्धार्थ गौतम को खीर का प्रसाद अर्पित किया था। इस घटना ने उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया। इसके बाद उन्होंने अत्यधिक कठोर तपस्या का मार्ग त्यागकर मध्यम मार्ग को अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे भगवान बुद्ध के रूप में विश्वविख्यात हुए।
सुजाता की इस महान सेवा और समर्पण की स्मृति में निर्मित सुजाता स्तूप आज बौद्ध श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। पुरातात्विक उत्खननों से प्राप्त अवशेष इस स्थल के प्राचीन वैभव और ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करते हैं। स्तूप की स्थापत्य शैली विभिन्न कालखंडों में हुए निर्माण एवं जीर्णोद्धार की कहानी भी प्रस्तुत करती है।
शांत वातावरण, ऐतिहासिक महत्व और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह स्थल विश्वभर से आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान बुद्ध के जीवन की उस प्रेरणादायक घटना का साक्षी बनने का अवसर प्रदान करता है। बोधगया की यात्रा सुजाता स्तूप के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है, क्योंकि यह करुणा, सेवा, त्याग और मध्यम मार्ग के संदेश का जीवंत प्रतीक है।
एक नज़र में
सुजाता के साथ संबद्ध, एक महिला जिसने बुद्ध को अपने ज्ञान से पहले खीर (मीठा चावल हलवा) की पेशकश की, उजाता स्तूप उदारता और दयालुता का प्रतीक है। बोध गया के पास स्थित, यह ऐतिहासिक बौद्ध स्थल उन भक्तों को आकर्षित करता है जो सुजाता के निस्वार्थ कार्य के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहते हैं। यह स्थल प्राचीन बौद्ध जीवन शैली की झलक भी प्रदान करता है।
यात्रा करने का सबसे अच्छा समय: सितंबर से अप्रैल।
इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स: मोबाइल, कैमरा, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की अनुमति है।